दैनिक पंचांग
मिथिला एवं वाराणसी का दैनिक पंचांग विवरण
पंचांग एवं व्रत-त्यौहार खोजें
🚩 मिथिला पंचांग (Mithila)
क्षेत्रीय मैथिल पंचांग परंपरा| 🪐मास / महीना | ज्येष्ठ (Jyeshtha) |
| 🌙पक्ष | कृष्ण पक्ष (Krishna Paksha) |
| 📅तिथि | द्वादशी (Dhadashi) |
| 🌌नक्षत्र | उत्तराभाद्रपद |
| 🌀योग | ऐन्द्र |
| ⚙️करण | बालव |
| 🌙राशि | मीन (Pisces) |
| ☀️सूर्य राशि | मिथुन (Gemini) |
| 🔱संवत् | विक्रम: 2083 शक: 1948 |
| 🌅सूर्योदय / सूर्यास्त | 05:01 AM 06:58 PM |
| 🌟शुभ मुहूर्त | अभिजीत मुहूर्त: 11:45 AM - 12:35 PM, नामकरण मुहूर्त (Naming Ceremony / Namkaran - Dynamic Algorithmic): प्रातः 09:15 AM - 01:00 PM |
| 🚫राहुकाल | राहुकाल: 04:30 PM - 06:00 PM (Rahu Kalam) |
| 🎉त्यौहार व व्रत | — |
विशेष टिप्पणी (Special Note):
मिथिला पंचांग पद्धति के अनुसार शुभ दिन। शिशु नामकरण संस्कार हेतु आज का दिन कल्याणकारी है। (Auspicious Naming Ceremony / Namkaran today.)
🚩 वाराणसी पंचांग (Varanasi)
पारंपरिक वाराणसी पंचांग पद्धति| 🪐मास / महीना | ज्येष्ठ (Jyeshtha) |
| 🌙पक्ष | कृष्ण पक्ष (Krishna Paksha) |
| 📅तिथि | द्वादशी (Dhadashi) |
| 🌌नक्षत्र | अश्विनी |
| 🌀योग | प्रीति |
| ⚙️करण | बालव |
| 🌙राशि | मीन (Pisces) |
| ☀️सूर्य राशि | मिथुन (Gemini) |
| 🔱संवत् | विक्रम: 2083 शक: 1948 |
| 🌅सूर्योदय / सूर्यास्त | 05:05 AM 06:56 PM |
| 🌟शुभ मुहूर्त | अभिजीत मुहूर्त: 11:40 AM - 12:30 PM, व्यापार आरंभ मुहूर्त (Business Start / Vyapar - Dynamic Algorithmic): प्रातः 10:20 AM - 12:15 PM |
| 🚫राहुकाल | राहुकाल: 04:00 PM - 05:30 PM (Rahu Kalam) |
| 🎉त्यौहार व व्रत | — |
विशेष टिप्पणी (Special Note):
वाराणसी पंचांग पद्धति के अनुसार शुभ दिन। नूतन व्यावसायिक प्रतिष्ठान शुभारंभ हेतु सर्वोत्तम दिन। (Auspicious Business Start / Vyapar today.)
पंचांग ज्ञानकोश एवं विस्तृत विश्लेषण
वैदिक कालगणना के पाँच अंग तथा विभिन्न पंचांग पद्धतियों का शास्त्रीय विश्लेषण।
पंचांग के पाँच अंग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण)
पंचांग हिन्दू कालगणना का मूलाधार है। यह पाँच अंगों से मिलकर बना है — तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। प्रत्येक अंग का हमारे दैनिक जीवन और शुभ मुहूर्त निर्धारण में विशेष महत्व है।
🌙1. तिथि (Tithi)
सूर्य और चंद्रमा के बीच 12° के देशांतर अंतर को एक तिथि कहा जाता है। एक चन्द्र मास में कुल 30 तिथियाँ होती हैं, जो शुक्ल पक्ष (1-15) और कृष्ण पक्ष (1-15) में विभाजित होती हैं।
| वर्ग | तिथियाँ | स्वभाव |
|---|---|---|
| Nanda (नंदा) | 1, 6, 11 | शुभ / आनंद |
| Bhadra (भद्रा) | 2, 7, 12 | मंगलकारी |
| Jaya (जया) | 3, 8, 13 | विजय / उत्साह |
| Rikta (रिक्ता) | 4, 9, 14 | रिक्त / अशुभ |
| Purna (पूर्णा) | 5, 10, 15 | पूर्णता / सिद्धि |
🌞2. वार (Vara)
सप्ताह के सात दिनों में से प्रत्येक दिन को वार कहते हैं। प्रत्येक वार का निर्णय सूर्योदय से होता है तथा उस वार के स्वामी ग्रह के अनुसार उसका शुभ-अशुभ प्रभाव माना जाता है।
- रविवार (सूर्य)
- सोमवार (चंद्र)
- मंगलवार (मंगल)
- बुधवार (बुध)
- गुरुवार (गुरु)
- शुक्रवार (शुक्र)
- शनिवार (शनि)
⭐3. नक्षत्र (Nakshatra)
संपूर्ण आकाश मंडल को 27 नक्षत्रों में विभाजित किया गया है। चंद्रमा प्रतिदिन एक नक्षत्र का भोग करता है। नक्षत्रों के स्वामी और उनके आराध्य देवता कार्य सिद्धि और चरित्र निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाते हैं।
🔯4. योग (Yoga) & 5. करण (Karana)
योग सूर्य और चंद्र के देशांश का योग है (27 योग होते हैं, जैसे प्रीति, आयुष्मान, सिद्धि)। करण एक तिथि का आधा भाग होता है (कुल 11 करण होते हैं, जिसमें 7 चर और 4 स्थिर हैं)।
Mithila vs Varanasi Panchang Comparison
यद्यपि दोनों परंपराएँ शास्त्रीय सूर्य-सिद्धांत पर आधारित हैं, फिर भी देशांतर, सूर्य संक्रांति और स्थानीय लोक संस्कृति के प्रभाव से पर्वों की तिथि और विवाह मुहूर्त निर्धारण में सूक्ष्म अंतर पाया जाता है।
| पहलू / मानदंड | 🚩 Mithila Panchang (मिथिला) | 🚩 Varanasi Panchang (वाराणसी) |
|---|---|---|
| प्रमुख क्षेत्र | उत्तरी बिहार, झारखंड और नेपाल का तराई क्षेत्र (मिथिलांचल)। | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं समस्त उत्तर भारत। |
| गणना का मुख्य ग्रंथ | सूर्य-सिद्धांत + विद्यापति परंपरा एवं स्थानीय पंचांग ग्रंथ। | काशी ज्योतिषाचार्य परंपरा, मुहूर्त चिंतामणि। |
| नव वर्ष / नव संवत् | जुड़ शीतल (मेष संक्रांति - सामान्यतः वैशाख प्रथम तिथि)। | चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (विक्रम संवत् आरंभ)। |
| सूर्योदय संदर्भ बिंदु | स्थानीय शहरों (दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी) के देशांतर अनुसार (+5 से +10 मिनट भिन्न)। | वाराणसी काशी देशांतर (82°58' E)। |
| मुख्य पर्व व उत्सव | जुड़ शीतल, मधुश्रावणी, सामा-चकेवा, कोजागरा (शरद पूर्णिमा), राम-सीता विवाह पंचमी। | देव दीपावली, महाशिवरात्रि (काशी विश्वनाथ), अन्नकूट, गंगा दशहरा। |
| विवाह / उपनयन मुहूर्त | मिथिला परंपरागत लग्न सारणी और नक्षत्र शुद्धि के कठोर नियम। | मुहूर्त चिंतामणि एवं धर्मसिंधु के सामान्य दिशा-निर्देश। |
चोघड़िया और ग्रहण (सूतक काल) निर्देश
चोघड़िया दिन और रात के समय में त्वरित यात्रा, खरीददारी अथवा कार्य आरंभ के लिए उत्तम मुहूर्त चुनने की सरल पद्धति है। ग्रहण काल में विशेष आध्यात्मिक साधना और सूतक काल के नियमों का पालन किया जाता है।
🕒 चोघड़िया वर्गीकरण एवं प्रभाव
| नाम | स्वामी ग्रह | प्रकृति | विहित कार्य |
|---|---|---|---|
| Amrit (अमृत) | Moon (चंद्र) | सर्वोत्तम | सभी प्रकार के शुभ कार्य |
| Shubh (शुभ) | Jupiter (गुरु) | शुभ | विवाह, यज्ञ, नवीन व्यापार |
| Labh (लाभ) | Mercury (बुध) | लाभदायक | शिक्षा, व्यापार, वित्तीय सौदे |
| Char (चर) | Venus (शुक्र) | चलायमान | यात्रा, वाहन क्रय, मशीनरी |
| Kaal (काल) | Saturn (शनि) | अशुभ | दीर्घकालिक संग्रह, कृषि कार्य |
| Udveg (उद्वेग) | Sun (सूर्य) | अशांत | सरकारी कार्य, वाद-विवाद |
| Rog (रोग) | Mars (मंगल) | हानिकारक | विहित छोड़कर (दवा लेना) |
🌑 ग्रहण सूतक काल नियम
सूतक काल वह अशुभ समय होता है जो ग्रहण लगने से पूर्व आरंभ होता है। इस अवधि में मंदिरों के पट बंद हो जाते हैं और देव आराधना के अतिरिक्त भौतिक कार्य वर्जित होते हैं।
*गंगा स्नान, दान-पुण्य और मंत्र जाप ग्रहण समाप्ति (मोक्ष) के पश्चात परम कल्याणकारी माने गए हैं।
पंचांग खोज एवं उपयोग निर्देश
आश्रम की पंचांग प्रणाली का उपयोग कर श्रद्धालु किसी भी तिथि अथवा पर्व की ज्योतिषीय स्थिति को सूक्ष्मता से समझ सकते हैं:
व्रत और पर्व खोज
एकादशी व्रत तिथियों, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि निशित काल तथा कोजागरा व मधुश्रावणी जैसे विशिष्ट क्षेत्रीय त्योहारों की शास्त्र सम्मत तिथियां कैलेंडर द्वारा सहज उपलब्ध हैं।
विशिष्ट शुभ मुहूर्त खोज
विवाह लग्न, नया गृह प्रवेश मुहूर्त, मुंडन संस्कार, नामकरण तथा नया व्यापारिक लेनदेन आरंभ करने हेतु नक्षत्र शुद्धि और चंद्र बल की उपयुक्त तिथियाँ दर्शाई जाती हैं।
राहुकाल एवं स्थानीय समय अंतर
राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल का दैनिक समय, जो दरभंगा (मिथिला) और काशी (वाराणसी) के वास्तविक सूर्योदय के अंतराल अनुसार स्व-संशोधित होता है।
राशि और ग्रह गोचर प्रभाव
चंद्रमा का नक्षत्र और राशि भ्रमण, एवं सूर्य संक्रांति काल जो गोचर चक्र का निर्धारण करते हैं और श्रद्धालुओं को मानसिक व शारीरिक बल प्रदान करते हैं।